Posts

प्रयास मे छुपी हे सफलता

Image
प्रयास मे छुपी है सफलता सुमन्तपुर मे राजा लाखवीर का राज्य शासन था। सुमन्तपुर की सरहद के पास सुखदास नाम का एक शिल्पी रहता था। वह शिल्पकला मे अत्यंत निपुण कारीगर था। सुंदर, कलात्मक एवं भव्य मूर्तिओ का सृजन किया करता था। एक दिन राजा लाखवीर वहा से गुजर रहे थे उन्होंने यह मूर्ति और शिल्पकला को देखकर बहुत मुग्ध हो गए। उन्होंने अपना रथ रोककर मूर्तिकार सुखदास को मिलने गए। उन्होंने शिल्पकार से खुद की मूर्ति बनाने का आदेश दिया। शिल्पकार सुखदास ने उनकी मूर्ति बनाने का काम शुरू किया। मूर्ति बनाते वक़्त जो कल्पना थी उस हिसाब से मूर्ति बन नहीं रही थी। उसने अनेक बार प्रयास किया लेकिन राजा लाखवीर की मूर्ति को सुंदरता नहीं दे पाए थे। इसीलिए वो हिम्मत हार के बाजू में निराशा से बैठ गया। इतने में उसकी नजर एक चीटि पर पडी। वो गेहू का दाना लेकर दीवार पर चढ़ने का प्रयास कर रही थी। चीटि ने अपना प्रयास जारी रखा और गेहू का दाना लेकर दीवार पर चढ़ने मे सफल हुयी। शिल्पकार सुखदास ने यह देखकर मन में विचार किया कि बारंबार प्रयास करने से सफलता जरूर मिलती है। निरंतर प्रयास करने से एक छोटी सी चीटि को भी सफलता...

वास्तुशास्त्र और वास्तुपुरुष उत्पत्ति

Image
वास्तुशास्त्र और वास्तुपुरुष उत्पत्ति वास्तुमूर्तिः परमज्योतिः वास्तु देवो पराशिवः वास्तुदेवेषु सर्वेषाम वास्तुदेव्यम  (समरांगण सूत्रधार, भवन निवेश)  वास्तुशास्त्र—अर्थात गृहनिर्माण की वह कला जो भवन में निवास कर्ताओं की विघ्नों, प्राकृतिक उत्पातों एवं उपद्रवों से रक्षा करती है. देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा रचित इस भारतीय वास्तु शास्त्र का एकमात्र उदेश्य यही है कि गृहस्वामी को भवन शुभफल दे, उसे पुत्र-पौत्रादि, सुख-समृद्धि प्रदान कर लक्ष्मी एवं वैभव को बढाने वाला हो. आदि काल में मानव का निवास स्थल वृक्षों की शाखाओं पर हुआ करता था। कालांतर में उसमें जैसे-जैसे बुद्धि का विकास होता गया वैसे-वैसे उसने परिस्थिति के अनुसार उपलब्ध सामग्री यथा बांस, खर पतवार, फूस, व मिट्टी आदि का उपयोग करके कुटियानुमा संरचना का अविष्कार किया तथा उसे निवास योग्य बनाकर उसमें निवास करने लगा, यह भवन का मात्र प्रारंभिक स्वरुप था वैदिक काल में भवन बनाने का विज्ञान चरम सीमा तक जा पहुंचा, हमारे धर्मग्रंथों में भी देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा का उल्लेख आता है जिन्होंनें रामायण काल से पूर्व लंका नगरी तथा...

निराकार निरंकुश

Image
निराकार निरंकुश खुले निराकार निरंकुश आकाश में हंसता घमंड, सूअर सी सोच जड़ बुद्धि को बनाता बढ़ा अखंड,  रोती है विद्वता, सशक्त होती प्रमाणता,  इस लाचार, छटपटाहट , थोपता,  निराकार तालमेल से बना समाज, सनातन के शासन में डाल रहा टांग है,  साझेदार, श्रेष्टता सी ओट में छिपता , दया करू, अस्तित्व जाल में फंसता है,  असंख्यों की भीड़ में मूर्खता,  छेड़ा है पर्याय, जैसे सागर की गहराई,  दिखे सुने तो मापे, चट्टानें...!  कमान मजबूत सनातन का है श्रृंगार,  इत्तर सा अवशेष बचा रहेगा ,  जो द्वार दर द्वार निहारेगा, भटकेगा,  कलियुग के ऋषि, रुकेगा तू कहा , सनातन की धार में कटेगा एक रोज़,  मुर्ख का आईना मुर्ख समान,  कटाक्ष है मेरा इस अद्रश्य पर्याय से,  कोई नही मिलेगा, मिले तुझे विश्वकर्मा,  इनके सिवा न होगा तेरा उम्मीदवार,  (रचनाकार - मयूर मिस्त्री) (विश्वकर्मा साहित्य भारत)

महर्षि स्वरूपा भगवान भौवन विश्वकर्मा

Image
वैदिक सूक्तो मे विश्वकर्म और विश्वकर्मा  महर्षि स्वरूपा भगवान भौवन विश्वकर्मा  भौवन विश्वकर्मा - महर्षि आपत्य के भौवन विश्वकर्मा हुए। उनका जन्म माध शुक्ल प्रतिपदा को हुआ था। उनके विषय में ऋग्वेद मे विस्तार से बताया गया है।  एतत स्वयंभुवो सजन वनं दिव्यं प्रकाशते । यत्रायजत राजेन्द्र विश्वकर्मा प्रतापवान॥ वनवास के समय अर्जुन इन्द्र के पास शिक्षा प्राप्त करने गये थे। लोमश ऋषि ने अर्जुन द्वारा प्रदत्त सन्देश युधिष्ठिर आदि पाण्डवो को सुनाकर उन्हे साथ लेकर यात्रा प्रारम्भ की। वर्तमान मे उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल के तीर्थो पर होते हुए वे उत्कल प्रदेश मे प्रविष्ठ हुये उस समय उन्होने युधिष्ठिर से ये शब्द कहे थे- हे राजन! यह स्वयंभू ब्रह्मा का दिव्य वन प्रकाशित हो रहा है। यहाँ प्रतापी राजाओ के इन्द्र(भौवन) विश्वकर्मा ने यज्ञ किया था। इससे द बाते स्वत: प्रमाणित हो जाती है | 1. यह दिव्य वन परसुराम की तपो भूमि महेन्द्र पर्वत के निकट उत्कल प्रदेश मे था अत: स्वयंभू भारत मे ही उत्पन्न हुए। 2. इनका काल महाभारत से पूर्व है। इनके काल पश्चात भौवन विश्वकर्मा हुये तथा उन्होने सर्वम...

महात्मा "अलख" भूरी बाई सुथार

Image
महात्मा "अलख" भूरी बाई सुथार विश्वकर्मा साहित्य भारत के माध्यम से अनेक विश्वकर्मा प्रतिभा को समाज में उत्तम स्थान प्राप्त मिले और उन्हें हर संभव सभी विश्वकर्मा वंशी बंधुओं समस्त कार्यक्रमों में उनको सम्मान मिले उनके नाम पर सम्मान पत्र, कार्यक्रमों के नाम, उनकी जन्म जयंती, उनके नाम पर पत्रिकाएं, अवार्ड, और बहुत इस तरह के कार्य द्वारा विश्वकर्मा समाज के महात्माओ, प्रतिभाओ को सम्मानित करना चाहिए यही प्रयास के साथ हम विश्वकर्मा साहित्य भारत के द्वारा अनेक सामाजिक विकास के प्रचार प्रसार अभियान कर रहे हैं।  आज आपको हम एक ऐसी प्रतिभा जो समस्त विश्वकर्मा समाज के लिए गौरव और धार्मिक महत्व से जुड़ी हुई है। विश्वकर्मा सुथार वंश के गौरव और महान संत महात्मा भूरी बाई सुथार जिन्हें अलख उपाधि से जाना जाता है। महात्मा श्री भूरी बाई को ‘अलख’ नाम किसी अन्य सन्त महात्मा ने अभिभूत होकर दिया था। “महात्मा भूरी बाई अलख” का जन्म राजसमन्द जिले के लावा सरदारगढ़ गाँव में संवत् 1949 में आषाढ़ शुक्ला 14 को एक सुथार परिवार में हुआ। माता का नाम केसर बाई और पिता का नाम रूपा जी सुथार है। उनके पति ...

पांचाल ब्राम्हणों की मान प्रतिष्ठा

Image
पांचाल ब्राम्हणों की मान प्रतिष्ठा वेदों पुराणों और अनेक ग्रंथो मे उल्लेखनीय पांचाल ब्राम्हणों की प्रतिष्ठा आदि काल से रही है थोड़ा संक्षिप्त मे बताने का प्रयास किया गया है। पांचाल ब्राह्मणेति हासः कथं ।। तत्र सुवर्णालंकार वाणिज्यों प जीविनः पांचाल ब्राह्मणा ।। शैवागम के अनुसार  पंचालाना च सर्वेषामा चारोSप्य़थ गीयते । षट् कर्म विनिर्मित्यनी पचांलाना स्मुतानिच ।। रूद्रयामल वास्तु तन्त्र में शिवाजी महाराज ने कहा कि शिवा मनुमंय स्त्वष्टा तक्षा शिल्पी च पंचमः ।। विश्वकर्मसुता नेतान् विद्धि प्रवर्तकान् ।। एतेषां पुत्र पौत्राणामप्येते शिल्पिनो भूवि ।। पंचालानां च सर्वेषां शाखास्याच्छौन कायनो ।। पंचालास्ते सदा पूज्याः प्रतिमा विश्वकर्मणः ।। रूद्रवामल वास्तु तन्त्र व्रत्यादि ।। उपरोक्त प्रमाणों में पाचांल शब्द का प्रयोग विश्वकर्मा जी के स्थान में किया गया है। अर्थात् रथकार और पांचाल दोनों शब्द विश्वकर्मा ब्राह्मण बोधक ही है। यज्ञ कर्म और देव कर्म संबंधी कर्म में कहीं कहीं विश्वकर्मा पाचांल ब्राह्मण की सज्ञां स्थापत्य भी कही गई है। जैसे भागवत स्कन्द 3 में स्थापत्य विश्वकर्म शास्...

भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या

Image
भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या आधुनिक भारत के महान इंजीनियर विश्वकर्मा वंशी कुलभूषण श्री मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या (15 सितंबर 1860 — 14 अप्रैल 1962) भारत के महान अभियन्ता एवं राजनयिक थे। उन्हें सन 1944 में भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से विभूषित किया गया था।  भारत में उनका जन्मदिन अभियन्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है। सभी देश वासियों को महान इंजीनियर विश्वकर्मा कुलभूषण मोक्षगुंडम विश्वेशरय्या के जन्मदिवस पर समस्त विश्वकर्मा समाज को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।  विश्वेश्वरैया का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक में 15 सितंबर 1860 को एक तेलुगु परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम वेंकाचम्मा था। पिता संस्कृत के विद्वान थे। विश्वेश्वरैया ने प्रारंभिक शिक्षा जन्मस्थान से ही पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने बंगलुरु के सेंट्रल कॉलेज में प्रवेश लिया। लेकिन यहां उनके पास धन का अभाव था। अत: उन्हें टयूशन करना पड़ा। विश्वेश्वरैया ने 1880 में बीए की परीक्षा में अव्व...