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વિશ્વકર્મા પ્રભુ વિશેનો ટૂંકો સાર - મયુરકુમાર મિસ્ત્રી

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સૃષ્ટિના રચયિત ભગવાન વિશ્વકર્મા વિશે ટૂંકો સાર પરિચય પ્રાચીનકાળમાં ભગવાન વિશ્વકર્માએ પોતાની અંગત શક્તિ દ્વારા વૈજ્ઞાનિક વરદાન આપીને માનવજીવનને કળા શીખવી હતી. આજે માણસ ભગવાન વિશ્વકર્માએ બતાવેલા માર્ગથી ભટકી ગયો છે. આવો જાણીએ મયુરભાઈ મિસ્ત્રી દ્વારા આ અંગે વિશેષ તથ્યો દ્વારા પરિચય. આપણે સૌ જાણીએ છીએ કે સૃષ્ટિનાં સર્જનહાર ભગવાન શ્રી વિશ્વકર્મા દાદાની પુરાણ તેમાં સૃષ્ટિના તમામ સવાલોના જવાબ આપેલા છે. ભૌતિકવાદના આ યુગમાં ભગવાન વિશ્વકર્માની પૂજા અને ઉપાસના એકદમ જરૂરી છે કારણ કે વિજ્ઞાનના યુગમાં ભગવાન વિશ્વકર્માનું શરણ લેવાથી જ અકસ્માતો અને માનસિક અશાંતિથી મુક્તિ શક્ય છે. ભૌતિક અને આધ્યાત્મિક પ્રગતિ ફક્ત મન અને યંત્રની ઓળખ દ્વારા જ પ્રાપ્ત કરી શકાય છે, તેથી બંને તત્વોની ચાલક શક્તિ ભગવાન વિશ્વકર્માના નિયંત્રણમાં છે. ગજ યંત્રમાં સપ્તસૂત્ર દ્રષ્ટિ સૂત્ર  ગજ  સૂતરની દોરી  કાટખૂણો  સાંધણી  મુંજની દોરી  પરિકર ઓળંબો  ગજ ઉપર બિરાજમાન નવ દેવ. દરેક દેવ ત્રણ ઈંચ પર સ્થાન (૧) રૂદ્ર  (૨) સૂર્ય  (૩) વિશ્વકર્મા  (૪) અગ્નિ  (૫) બ્રહ્મા  (૬...

भगवान विश्वकर्मा निर्मित सुदर्शन चक्र

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भगवान विश्वकर्मा निर्मित सुदर्शन चक्र क्षिप्तं क्षिप्तं रणे चैतत् त्वया माधव शत्रुशु । हत्वाप्रतिहतं संख्ये पाणिमेष्यति ते पुनः ।।  - महाभारत, आदिपर्व  ॐ साधनं नास्ति सर्वलोकानां सर्वसाधक:।  करोति लोहकर्माणि, लोकान् रक्षति सानग:।।  ओम् ददौ शस्त्राणि देवानां, दुष्टनिग्रहकारणात्।   ॐ स च सर्वजगत्कर्ता, सद्योजातमुखोद्भभव:।।  ओम् शूलं ददाति भर्गाय, चक्रं दत्तंच विष्णवे।  पाशस्तु ब्राह्मणे दत्तो, निर्मूत्यागमसानग:।।  यजुर्वेद अध्याय ३१, मंत्र १७ के अनुसार भगवान् विश्वकर्मा ने पृथ्वी, अग्नि, जल, आकाश और वायु की रचना की है । आविष्कार एवं निर्माण कार्यों के सन्दर्भ में इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पाण्डवपुरी, सुदामापुरी, शिवमण्डलपुरी आदि का निर्माण भगवान विश्वकर्मा के द्वारा किया गया है । पुष्पक विमान का निर्माण तथा सभी देवों के भवन और उनके दैनिक उपयोगी होने वाले वस्तुएं भी इनके द्वारा ही बनाया गया है । कर्ण का कुण्डल, विष्णु भगवान् का सुदर्शन चक्र, शंकर भगवान् का त्रिशूल और यमराज का कालदण्ड इत्यादि वस्तुओं का निर्माण भगवान् व...

नारदजी की वीणा

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नारदजी की वीणा  मुनियों की सभा में सूत कथा कह रहे थे नए-नए प्रश्नों में नहीं कथा के बारे में कुलपति मुनि शौनक नई नई चर्चाऐ सुनते रहते थे और सभी को सुनने में तल्लीन भी कर रहे थे तभी वहां पर वीणा का मधुर स्वर सुनाई दिया।खा सभी ने आकाश मठ की तरफ देखा तो देवश्री नारद आ रहे थे। उनकी देवी वीणा पर उनकी उंगलियां फिरते मधुर ध्वनि उत्पन्न हो रही थी और उस ध्वनि ऑन के साथ नारायण नारायण नाम का उच्चार भक्ति मार्ग सहीत नारद जी आ रहे थे। श्रोता वक्ताओं और सभी ने खड़े होकर देवर्षि नारद जी का अभिवादन किया और उनको उचित आसन देकर मुनि शौनक मैं उनका अध्यॅ पाद्य आदि अर्पण कर के पूजन किया। सदा में देवर्षि विराजे और मुनि शौनक ने प्रश्न किया हे देवर्षि आपके जैसे महापुरुष के दर्शन निरथॅक नहीं होते। आज हम सबको आपके दर्शन हुए हैं वही हमारा अहोभाग्य है आपका आगमन का कोई शुभ है तू है वह तो हमें कहिए और साथ ही आपके सत्संग का हमें भी लाभ दीजिए। देवर्षि बोले है - हे मुनिओ आपको धन्य है की आप सभी इस तरह के ज्ञानसत्रो की योजना कर नित्य ज्ञानचर्चा के द्वारा परमात्मा की भक्ति कर रहे हो। मैं आकाश मार्ग पर स्वर...

द्वापर की द्वारिका

मन्त्रमुग्ध द्वारिका विश्वकर्मा जी के द्वारा अनेक निर्माण कथाएं प्रचलित और ग्रंथो मे वर्णित है। भगवान विश्वकर्मा द्वारा निर्मित द्वारिका सभी निर्माणों में सबसे श्रेष्ट है। और अनंत सुख सुविधा से परिपूर्ण नगरी बनाई गई थी। कहा जाता है कि विश्वकर्मा जी ने गज के द्वारा चारो युगों मे महत्वपूर्ण निर्माण किए हैं। सत्ययुग मे सोने के गज से अमरावती नगरी का निर्माण किया था। त्रेतायुग मे चांदी के गज से लंका नगरी का निर्माण हुआ था। द्रापरयुग मे चंदन और बांस के गज के द्वारा द्वारिकापुरी का निर्माण किया था। और कलियुग में काष्ठ और लौह से बने गज द्वारा चौसठ कलाओं का निर्माण किया था। भारतवर्ष की सात मोक्षदायिका पुरियों में से द्वारावती एक है जो द्वारका के रूप में विख्यात है। विविध पुराणों में द्वारकापुरी को कुशस्थली, गोमती द्वारका, चक्रतीर्थ, आनर्तक क्षेत्र एवं ओखा-मण्डल(उषा मंडल) इत्यादि विविध नामों से अभिहित किया है। माना जाता है कि महाराज रैवत ने समुद्र के मध्य की भूमि पर कुश बिछाकर एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया था, जिस कारण इस भूमि का नाम कुशस्थली पड़ा। एक अन्य मत के अनुसार कुश नामक दैत्य के नाम से कुशस...

विश्वकर्मस्तोत्रम्

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विश्वकर्मस्तोत्रम्   विश्वकर्म ध्यानम् । न भूमिर्न जलञ्चैव न तेजो न च वायवः नाकाशं च न चित्तञ्च न बुद्धीन्द्रियगोचराः न च ब्रह्मा न विष्णुश्च न रुद्रश्च तारकाः सर्वशून्या निरालम्बा स्वयम्भूता विराटसत् सदापरात्मा विश्वात्मा विश्वकर्मा सदाशिवः ॥ श्रितमध्यतमध्यस्तं ब्रह्मादिसुरसेवितम् । लोकाध्यक्षं भजेऽहं त्वां विश्वकर्माणमव्ययम् ॥ प्राकादिदिङ्मुखोत्पन्नो सनकश्च सनातनः । अभुवनस्य प्रत्नस्य सुपर्णस्य नमाम्यहम् ॥ अखिलभुवनबीजकारणम् । प्रणवतत्त्वं प्रणवमयं नमामि ॥ पञ्चवक्त्रं जटाधरं पञ्चदशविलोचनम् । सद्योजाताननं श्वेतं च वामदेवन्तु कृष्णकम् ॥ अघोरं रक्तवर्णं च तत्पुरुषं हरितप्रभम् । ईशानं पीतवर्णं च शरीरं हेमवर्णकम् ॥ दशबाहुं महाकायं कर्णकुण्डलशोभितम् । पीताम्बरं पुष्पमालं नागयज्ञोपवीतिनम् ॥ रुद्राक्षमालासंयुक्तं व्याघ्रचर्मोत्तरीयकम् । पिनाकमक्षमालाञ्च नागशूलवराम्बुजम् ॥ वीणां डमरुकं बाणं शङ्खचक्रधरं तथा । कोटिसूर्यप्रतीकाशं सर्वजीवदयापरम् ॥ विश्वेशं विश्वकर्माणं विश्वनिर्माणकारिणम् । ऋषिभिः सनकाद्यैश्च संयुक्तं प्रणमाम्यहम् ॥ इति विश्वकर्मस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

17 सितंबर विश्वकर्मा पूजा महोत्सव

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17 सितंबर विश्वकर्मा पूजा महोत्सव भगवान विश्वकर्मा जी के बारे में बहुत सी मान्यताएं है. कुछ धर्मशास्त्रियों का मानना है कि भगवान विश्वकर्मा का जन्म अश्विन मास की कृष्णपक्ष को हुआ था जबकि दूसरी तरफ लोग कहते हैं कि इनका जन्म भाद्रपद मास की अंतिम तिथि को हुआ था. और ज्यादातर प्रमाण मे माध शुक्ल त्रयोदशी के दिन भगवान विश्वकर्मा जी का प्रकट दिन हे, वहीं जन्म तिथि से अलग एक ऐसी मान्यता निकली जिसमें विश्वकर्मा पूजा को सूर्य के परागमन के अनुसार तय किया गया. और कुछ कन्या संक्रांति का प्रमाण दे रहे हैं, तो यह दिन बाद में सूर्य संक्रांति के दिन रूप में माना जाने लगा. यह लगभग हर साल 17 सितंबर को ही पड़ता है इसलिए इसी दिन पूजा-पाठ किया जाने लगा। साथ ही एक ओर कहानी भी जुड़ी हुई है हावड़ा ब्रिज के निर्माण मुहूर्त के दिन विश्वकर्मा जी की पूजा हुयी थी वो दिन 17 सितंबर  था, तभी से 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा दिवस के अवसर पर मनाया जाता है। शुरुआत में वेस्ट बंगाल ही यह उत्सव मनाता था धीरे धीरे उनके साथी राज्य भी मनाने लगे आज यह आवाज पूरे देश में गूंज ले रही है।  मेरे मत अनुसार विश्वकर...

विश्वाकर्मोपनिषत्

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विश्वाकर्मोपनिषत् अथ विश्वाकर्मोपनिषत् ।  ज्योतिर्मयं शान्तमयं प्रदीप्तं, विश्वात्मकं विश्वजितन्निरीशम् ।  अद्यन्तशून्यं सकलैकनाथं, श्रीविश्वकर्माणमहं नमामि ॥  ॐ विश्वकर्मा दिशां पतिः स नः पशून्पातु सोऽस्मान्पातु तस्मै नमः ।  प्रजापतिकद्रो वरुणोऽग्निर्दिशाम्पतिः स नः पशून्पातु सोऽस्मान्पातु तस्मै नमः ॥  अथ पुरुषो ह वै विश्वकर्मणो कामयत प्रजाः सृजेयेति ।  विश्वकर्मणः प्राणो जायते मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।  खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥  विश्वकर्मणो ब्रह्मा जायते ।  विश्वकर्मणो रुद्रो जायते ।  विश्वकर्मणो नारायणो जायते ।  विश्वकर्मणः प्रजापतयः प्रजायन्ते ।  विश्वकर्मणो द्वादशादित्या रुद्रा वसवः सर्वे देवताः सर्वे ऋषयः सर्वाणि छन्दांसि सर्वाणि भूतानि वा समुत्पद्यन्ते ।  विश्चकर्मणि प्रवर्धन्ते ।  विश्वकर्मणि प्रलीयन्ते ।  ॐ अथ नित्यो देवो एको विश्वकर्मा ।  यो देवानां नामधारी एक एव विश्वकर्मा ।  विराट विश्वकर्मा ।  स्वराड्विश्वकर्मा ।  सम्राड्विश्वकर्मा ।  अथ रुद्रो व...