एक रोज़ नजर थम सी गई उस फव्वारे पर,

एक रोज़ नजर थम सी गई उस फव्वारे पर,
एक रोज़ नजर थम सी गई उस फव्वारे पर,
जो फैलाए बूंदे रंगीन जमीन पर,

ध्यान रख बूँदों पर नहीं भेद उनके छींटाव पर,
समुह बनाए चलता है बनकर एकता के ध्येय पर,

आज़माकर देख उस समुह को जो बिखरा है ज़मी पर,
जो दिखाता एकजुट हे गिरता है खुद ज़मीर पर, 

हवा में भी बिखरती है बूंद, बहती धार एकरूप पर, 
देख ठान उस फव्वारे से, भीतर भर्रा दबाव पर, 

यंत्र गतिमान करते रखता है जो चलता है लक्ष्य पर, 
सुन उस बूँदों की आवाज होती है एक ताल पर, 

रंग उन बूँदों के थे हज़ारों, लगते मोती धरातल पर, 
बन जाऊँ मोती, या बन जाऊँ यंत्र रहूँगा एक समुह पर, 

तरीके, तारण, तारीफे होते हैं सन्मान पर,
हो निडर मन बूँदों जैसा, कर दिखा समुह ज़मी पर,

एक रोज़ नजर थम सी गई उस फव्वारे पर,
जो फैलाए बूंदे रंगीन जमीन पर,

©️मयूर मिस्त्री (मनपसंद)

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