मेरे आविष्कार, मेरे विश्वकर्मा

मेरे आविष्कार, मेरे विश्वकर्मा पृथ्वी की मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास का वर्णन और ग्रंथो मे दर्शाया गया चीख चीख के कह रहा हैं कि विश्वकर्मिय ब्राह्मण जाति ही तकनीक , शिल्प, सभ्यता, निर्माण, विज्ञान, वास्तुशास्त्र जैसे अनेक परम्परागत कार्यो में निपुण रही है। ज्यादातर शिल्पकारों के काम का उल्लेख मह्त्वपूर्ण रहा है। क्योंकि परम्परागत शिल्पकार के बिना मानव सभ्यता, संस्कृति तथा विकास की बात सिर्फ कल्पना ही लगती हैं। विश्वकर्मिय शिल्पकारों ने प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक विभिन्न कला सभ्यता के स्वरुपों में लोहकार, रथकार, सोनार, ताम्रकार, शिल्पकार, वास्तुविद अपने कौशल से भारतीय एवं दुनिया की अनेक धरती को सजाने में कोई भी कसर छोड़ी नहीं है । समस्त धारणा से उपर सोचे तो सृजनात्मक की तरह परम्परागत शिल्पकार अपने औजारों के उपयोग से मानव सभ्यता को सरल, सहज और सुंदर बनाने का तकनीकी विकास कर रहे हैं। आज समस्त सृष्टि जो हमे सुवर्ण रुप में दृष्टिगोचर हो रही है वह हमारे परम्परागत शिल्पकारों के खून पसीने और कड़े श्रम की ही देन है। यह बात हम गर्व से कह सकते हैं कि हम विश्वकर्मा हे। मनुष्य ...